Chalo Phir ajnabee ban jayein..

A Sindhi friend of mine once said to me, “the peculiar thing about regret is that you have it, even when you know you shouldn’t be having it.” He was right. But, would you not agree if I said, some regrets are worth having?

Anyway, speaking in the context of regrets. Here’s a small piece, which I might or might not have written. 🙂

चलो फिर अजनबी बन जाएं..

फिर मिलूं जब तुमसे,
तो वो मुलाकात पहली हो..
कुछ कहो,तुम मुझसे,मैं तुमसे,
तो वो हर बात पहली हो..

दरमियान जो अब हैं,
उन सन्नाटों का कोई ज़िक्र न हो..
फ़ोन पे बीतती,
रातों की कोई फ़िक्र न हो..

नाम आये जब तुम्हारा,
तो दिल में कोई हूक न हो..
ख्वाबों में अतीत की ..
कोई बन्दूक न हो!

न हों तेरे चेहरे पे,
निशान मेरे छुअन के..
न खुशबू हो तेरी,
फैली मेरे बदन पे..

न फैला हो आंसू से,
काजल तुम्हारा..
न बेदर्द रोये,
कलेजा हमारा..

बाइक की पिछली सीट से,
तेरा एहसास खो सा जाए..
तेरी गैरजहाज़िरी का,
भरोसा हो सा जाए..

कुछ रहे बस बचा,
तो वो एहसास ये हो..
ना जान कर भी बेशक,
मुझे जानते हो..

मुझे भी लगे..
कोई नाता है तुमसे..
रहो पास मेरे,
यूँ बिछडो न हमसे..

एक नए सिरे से कभी चलो,
एक दूसरे की फिर से ज़िन्दगी बन जाएं..
भूल जाएं एक दूसरे को और..
चलो फिर अजनबी बन जाएं!

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1 thought on “Chalo Phir ajnabee ban jayein..”

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